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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अब मासिक धर्म स्वास्थ्य भी मौलिक अधिकार

Menstrual Health Fundamental Right India : भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए मासिक धर्म स्वास्थ्य (Menstrual Health & Hygiene) को संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित कर दिया। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि मासिक धर्म महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और निजता से जुड़ा विषय है और इसकी अनदेखी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए अधिकारों का उल्लंघन है।

शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मासिक धर्म  कोई सामाजिक वर्जना या शर्म का विषय नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है, जिसे सम्मान और संवैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए।

मासिक धर्म स्वास्थ्य = मौलिक अधिकार

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले ‘जीवन के अधिकार’ और ‘निजता के अधिकार’ का अभिन्न हिस्सा है। अदालत के अनुसार, जब तक महिलाओं और किशोरियों को स्वच्छ, सुरक्षित और सुलभ मासिक धर्म सुविधाएँ उपलब्ध नहीं कराई जाएँगी, तब तक समानता और गरिमा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश

▶️ सभी स्कूलों में मुफ्त सैनिटरी पैड

देश के सभी सरकारी, निजी और सहायता प्राप्त स्कूलों में पर्यावरण के अनुकूल (ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल) सैनिटरी पैड निःशुल्क उपलब्ध कराए जाएंगे।

▶️ जेंडर-सेग्रेगेटेड शौचालय अनिवार्य

हर स्कूल में लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग, सुरक्षित और स्वच्छ शौचालय अनिवार्य होंगे।
इन शौचालयों में पानी, साबुन और स्वच्छता से जुड़ी सभी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी।

▶️ दिव्यांग छात्रों के लिए विशेष सुविधाएँ

विशेष आवश्यकता (दिव्यांग) वाले विद्यार्थियों के लिए डिसएबिलिटी-फ्रेंडली इंफ्रास्ट्रक्चर और मासिक धर्म से जुड़ी आवश्यक सुविधाएँ सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

▶️ पीरियड मैनेजमेंट कॉर्नर

स्कूलों में “Menstrual Hygiene Management Corners” स्थापित किए जाएंगे, जहाँ आपात स्थिति के लिए अतिरिक्त सैनिटरी उत्पाद,मासिक धर्म से जुड़ी जानकारी,मार्गदर्शन और शैक्षिक सामग्री उपलब्ध होगी।

▶️ तीन महीने में लागू करने का आदेश

सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर इन निर्देशों को लागू करने और सुप्रीम कोर्ट में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया गया है।

फैसले का व्यापक प्रभाव

📌 शिक्षा में भागीदारी बढ़ेगी

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मासिक धर्म के दौरान सुविधाओं की कमी के कारण बड़ी संख्या में लड़कियाँ स्कूल नहीं जा पातीं, जो शिक्षा के अधिकार के प्रभावी उपयोग में बाधा बनता है। यह फैसला लड़कियों की नियमित स्कूल उपस्थिति को बढ़ावा देगा।

📌 स्वास्थ्य और गरिमा की सुरक्षा

अदालत ने कहा कि स्वच्छता की कमी महिलाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। यह फैसला महिलाओं को सम्मानजनक और सुरक्षित वातावरण देने की दिशा में अहम कदम है।

📌 सामाजिक वर्जनाओं पर सीधा प्रहार

फैसले में कहा गया है कि पीरियड्स को लेकर फैली झिझक, शर्म और चुप्पी समाज की प्रगति में बाधक है। इस निर्णय का उद्देश्य इन रूढ़ियों को तोड़ना और खुले संवाद को बढ़ावा देना है।

सरकार और समाज की संयुक्त जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि सरकार पहले से ही सैनिटरी नेपकिन पर जीएसटी में कटौती और स्कूलों में वितरण जैसी योजनाएँ चला रही है, लेकिन अब मासिक धर्म स्वास्थ्य नीतिगत विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार बन चुका है।

अदालत ने जोर देते हुए कहा कि केवल सरकारी योजनाएँ पर्याप्त नहीं होंगी।समाज, परिवार और शैक्षणिक संस्थानों को भी जागरूकता फैलाने और इस विषय पर संवाद को सामान्य बनाने की जिम्मेदारी निभानी होगी।

विश्लेषण: क्यों ऐतिहासिक है यह फैसला?

  • यह फैसला महिलाओं के स्वास्थ्य को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है।
  • इससे लड़कियों की शिक्षा में आने वाली सामाजिक और संरचनात्मक बाधाएँ कम होंगी।
  • यह समानता, गरिमा और सार्वजनिक स्वास्थ्य को जोड़ते हुए नीति-निर्माण को नई दिशा देता है।
  • यह निर्णय भारत में महिलाओं के अधिकारों के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाएगा।

Author

  • Rashtr Khabar

    A passionate and truth-driven news reporter with a keen eye for detail and a commitment to ethical journalism. I specialize in delivering accurate, timely, and engaging news that informs the public and strengthens trust in media.

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