“खेती के लिए मौत का समझौता?” भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर भड़के किसान नेता सरवन सिंह पंधेर

चंडीगढ़। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर सियासत और किसान आंदोलन दोनों गरमाने लगे हैं। किसान नेता Sarwan Singh Pandher ने इस समझौते को “खेती के लिए मौत का समझौता” करार देते हुए गंभीर आशंका जताई है कि यदि इसमें कृषि, दालें और डेयरी सेक्टर को शामिल किया गया, तो इसका सीधा असर देश के छोटे और मध्यम किसानों पर पड़ेगा। पंधेर का आरोप है कि सरकार इस समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं कर रही, जिससे किसानों में संशय और चिंता बढ़ रही है।
क्या है पूरा विवाद?
किसान संगठनों का दावा है कि प्रस्तावित India–US Trade Deal में कृषि उत्पाद, दालें और डेयरी सेक्टर को शामिल करने की तैयारी है। उनका कहना है कि अमेरिका की ओर से ऐसे संकेत मिले हैं। वहीं भाजपा नेताओं का कहना है कि खेती और डेयरी इस डील का हिस्सा नहीं हैं और किसानों को भ्रमित किया जा रहा है। यही विरोधाभास इस पूरे विवाद की जड़ बन गया है।
किसानों की मुख्य चिंताएं क्या हैं?
यदि अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पाद भारतीय बाजार में बड़े पैमाने पर आते हैं, तो किसान संगठनों के मुताबिक:
- एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है
- घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है
- छोटे और सीमांत किसानों की आय प्रभावित हो सकती है
- डेयरी क्षेत्र में स्थानीय उत्पादकों को कड़ी प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ सकती है
- पंजाब और हरियाणा जैसे कृषि प्रधान राज्यों में यह मुद्दा भावनात्मक और आर्थिक दोनों स्तर पर जुड़ा हुआ है।
किन कानूनों को जोड़कर देख रहे हैं किसान?
पंधेर ने हाल के कुछ विधायी बदलावों को भी इस संदर्भ में जोड़ा है, Seed Act में प्रस्तावित बदलाव निजी और विदेशी कंपनियों को बढ़त दे सकते हैं। Electricity (Amendment) Bill से कृषि सब्सिडी पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है। 29 श्रम कानूनों को समेटकर बनाए गए चार नए Indian Labour Codes को मजदूर हितों के खिलाफ बताया जा रहा है। Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (मनरेगा) के नियमों में बदलाव से ग्रामीण आय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। हालांकि, केंद्र सरकार का पक्ष है कि ये सभी कदम आर्थिक सुधार, निवेश बढ़ाने और रोजगार सृजन के उद्देश्य से उठाए गए हैं।
28 फरवरी तक एकजुटता, 1 मार्च को नई रणनीति
किसान मजदूर मोर्चा (केएमएम) ने ऐलान किया है कि 28 फरवरी तक पंजाब की सभी किसान जत्थेबंदियों को एक मंच पर लाने की कोशिश की जाएगी। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो 1 मार्च को बैठक कर आंदोलन की अगली रणनीति तय की जाएगी। इससे संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में पंजाब में फिर से बड़ा किसान आंदोलन देखने को मिल सकता है।
मुख्यमंत्री से सीधा संवाद की मांग
पंधेर ने पंजाब के मुख्यमंत्री Bhagwant Mann से अपील की कि वे मोगा दौरे के दौरान किसानों से सीधे संवाद करें। उन्होंने आरोप लगाया कि शंभू और खनोरी मोर्चों से जुड़े करीब 3 करोड़ 77 लाख रुपये का मुआवजा अभी भी लंबित है।“अगर मुख्यमंत्री खुद को किसान हितैषी बताते हैं, तो उन्हें किसानों के सवालों का जवाब देना चाहिए,” पंधेर ने कहा।
हरियाणा सरकार पर भी सवाल
पंधेर ने हरियाणा के मुख्यमंत्री Nayab Singh Saini के उस दावे पर सवाल उठाए, जिसमें कहा गया कि हरियाणा सरकार 24 फसलों की एमएसपी पर खरीद करती है। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलनों के दौरान हरियाणा की सीमाओं पर जो स्थिति बनी, उससे सरकार की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं।
अंदरूनी मतभेदों पर क्या बोले पंधेर?
किसान नेता ने स्वीकार किया कि कुछ मुद्दों पर डल्लेवाल साहिब के साथ मतभेद रहे, खासकर मरणव्रत (अनशन) की रणनीति को लेकर। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि ये मतभेद इतने बड़े नहीं हैं कि साथ आना संभव न हो।
आगे क्या?
भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर अभी आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं हुए हैं। ऐसे में दावे और प्रतिदावे जारी हैं। फिलहाल, किसान संगठनों ने साफ कर दिया है कि यदि उनकी आशंकाओं का समाधान नहीं हुआ, तो आंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा। आने वाले कुछ दिन पंजाब और राष्ट्रीय राजनीति के लिए अहम साबित हो सकते हैं।






