लोकसभा में 131वां संविधान संशोधन बिल गिरा, दो-तिहाई बहुमत न जुटा सकी सरकार !


नई दिल्ली : लोकसभा में महिला आरक्षण कानून से जुड़े संविधान के 131वें संशोधन विधेयक को बड़ा झटका लगा है। शुक्रवार को हुई वोटिंग में यह बिल आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका और गिर गया। विधेयक के समर्थन में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। इस नतीजे के बाद संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन (डीलिमिटेशन) को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।
सरकार का कहना है कि वह महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है, जबकि विपक्ष ने इस विधेयक को “राजनीतिक रणनीति” करार दिया है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया कि संबंधित अन्य संशोधन प्रस्तावों को फिलहाल आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।
क्या था विधेयक का उद्देश्य
महिला आरक्षण अधिनियम 2023 पहले ही लागू किया जा चुका है, जिसके तहत संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है। लेकिन नए संशोधन प्रस्ताव में इस आरक्षण को आगामी परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने की बात कही गई थी। यहीं से विवाद शुरू हुआ। विपक्षी दलों का कहना है कि महिलाओं को आरक्षण तत्काल मौजूदा 543 लोकसभा सीटों पर ही लागू किया जाना चाहिए, न कि भविष्य में सीटों की संख्या बढ़ने के बाद।
संसद में तीखी बहस
गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा कि कुछ दल प्रक्रिया को लेकर भ्रम फैलाकर असल मुद्दे से ध्यान भटका रहे हैं। शाह ने यह भी कहा कि सीटों की संख्या बढ़ाने से जनप्रतिनिधित्व मजबूत होगा और सांसदों पर बोझ कम होगा।
दूसरी ओर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस विधेयक को महिला सशक्तिकरण से अलग बताते हुए इसे “चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश” बताया। उनका आरोप था कि यह प्रस्ताव सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे एससी, एसटी व ओबीसी समुदायों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
‘जादूगर’ टिप्पणी पर हंगामा
बहस के दौरान राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री को ‘जादूगर’ कहे जाने पर सदन में भारी हंगामा हुआ। सत्ता पक्ष के कई वरिष्ठ नेताओं ने इसे असंसदीय बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई और माफी की मांग की। इस विवाद ने विधेयक पर गंभीर चर्चा को कुछ समय के लिए बाधित कर दिया।
दक्षिण भारत की चिंता
विधेयक को लेकर दक्षिण भारत के कई राज्यों ने भी चिंता जताई है। उनका मानना है कि परिसीमन के बाद जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होगा, जिससे दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक ताकत कम हो सकती है। डीएमके और अन्य क्षेत्रीय दलों ने इसे संघीय ढांचे के लिए खतरा बताया है।
कुछ नेताओं का यह भी कहना है कि जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे हैं, उन्हें इस प्रक्रिया में नुकसान उठाना पड़ सकता है।
सरकार का पक्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कहा कि महिला आरक्षण महिलाओं का अधिकार है, कोई उपकार नहीं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि परिसीमन प्रक्रिया निष्पक्ष होगी और किसी राज्य या वर्ग के साथ अन्याय नहीं होगा। सरकार का दावा है कि इस कदम से लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और नीति निर्माण में संतुलन आएगा।
भारत में महिला आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र रहा है। कई दशकों से संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की मांग उठती रही है। 2023 में पारित कानून को ऐतिहासिक कदम माना गया, लेकिन इसके लागू होने की प्रक्रिया और समयसीमा को लेकर अब भी मतभेद बने हुए हैं। परिसीमन, यानी जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण, भी एक संवेदनशील राजनीतिक विषय रहा है। इसे लेकर क्षेत्रीय असंतुलन और प्रतिनिधित्व के मुद्दे बार-बार उठते रहे हैं।
131वें संशोधन विधेयक के गिरने से स्पष्ट हो गया है कि महिला आरक्षण पर सहमति के बावजूद उसकी प्रक्रिया पर गहरा मतभेद है। इससे आगामी चुनावों में यह मुद्दा प्रमुख राजनीतिक एजेंडा बन सकता है। महिला संगठनों और सामाजिक समूहों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि सरकार बिना देरी के आरक्षण लागू करने के लिए क्या नया रास्ता निकालती है। वहीं विपक्ष इस मुद्दे को जनहित और सामाजिक न्याय से जोड़कर सरकार को घेरने की कोशिश करेगा।







