पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन: पंडवानी की अमर आवाज हुई खामोश, लोक कला जगत में शोक की लहर

रायपुर: छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्वभर में नई पहचान दिलाने वाली पंडवानी की महान गायिका और पद्म विभूषण सम्मान से अलंकृत डॉ. तीजन बाई का शनिवार देर रात निधन हो गया। उन्होंने तड़के रात 3:15 बजे रायपुर स्थित एम्स में अंतिम सांस ली। वह 70 वर्ष की थीं और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं। उनके निधन से लोक कला, संगीत और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
पंडवानी को दिलाई वैश्विक पहचान
डॉ. तीजन बाई ने अपनी प्रभावशाली आवाज, सशक्त अभिनय और अनूठी प्रस्तुति शैली के माध्यम से महाभारत की कथाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। उनकी कला ने पारंपरिक पंडवानी गायन को देश की सीमाओं से बाहर पहुंचाया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। उन्होंने कई दशकों तक भारत की लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हुए दुनिया के अनेक देशों में प्रस्तुति दी और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर स्थापित किया।
गांव से शुरू हुआ सफर, दुनिया तक पहुंची पहचान
डॉ. तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के भिलाई के निकट गनियारी गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम हुनुकलाल परधा और माता का नाम सुखवती था। बचपन में वे अपने नाना ब्रजलाल से महाभारत की कथाएं सुना करती थीं। यही कहानियां आगे चलकर उनके जीवन और कला की सबसे बड़ी प्रेरणा बनीं। उनकी प्रतिभा को पहचानने वाले उमेद सिंह देशमुख ने उन्हें मार्गदर्शन दिया, जिसके बाद उन्होंने बेहद कम उम्र में अपनी कला का सफर शुरू किया।
13 वर्ष की उम्र में किया पहला सार्वजनिक प्रदर्शन
महज 13 वर्ष की आयु में डॉ. तीजन बाई ने पहली बार सार्वजनिक मंच पर पंडवानी की प्रस्तुति दी। इसके बाद उन्होंने लगातार अपनी कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया और देश-विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी प्रस्तुतियां केवल गायन तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि अभिनय, भाव-भंगिमा और कथावाचन के अद्भुत संगम ने उन्हें भारतीय लोक कला की सबसे प्रतिष्ठित हस्तियों में शामिल कर दिया।






