12 फीट लंबे घड़ियाल का सफल रेस्क्यू, पंजाब-राजस्थान वन विभाग की बड़ी कामयाबी; ब्यास नदी में होगा पुनर्वास

जैसलमेर/चंडीगढ़ : वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में पंजाब और राजस्थान के वन विभागों ने संयुक्त अभियान के तहत एक बड़ी सफलता हासिल की है। इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) से लगभग 12 फीट लंबे वयस्क घड़ियाल को सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया गया है। कई महीनों तक लगातार उसकी गतिविधियों पर नजर रखने के बाद विशेषज्ञ टीम ने राजस्थान के जैसलमेर जिले के मोहानगढ़ क्षेत्र में अभियान चलाकर उसे सुरक्षित पकड़ लिया।
फिलहाल घड़ियाल को पंजाब के छतबीड़ चिड़ियाघर लाया गया है, जहां उसका स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है। सभी जांच पूरी होने के बाद उसे ब्यास नदी संरक्षण रिजर्व में प्राकृतिक आवास के लिए छोड़ा जाएगा।
मार्च से चल रही थी निगरानी
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इस घड़ियाल को पहली बार 13 मार्च 2026 को श्रीगंगानगर के पास इंदिरा गांधी नहर में देखा गया था। इसके बाद राजस्थान वन विभाग ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पंजाब के विशेषज्ञों से सहयोग मांगा।
हालांकि तेज जल प्रवाह और घड़ियाल के लगातार स्थान बदलने के कारण शुरुआती कई रेस्क्यू अभियान सफल नहीं हो सके। मई और जून के दौरान भी उसकी लोकेशन कई बार मिली, लेकिन पानी का स्तर अधिक होने के कारण अभियान को स्थगित करना पड़ा।
मोहानगढ़ में मिला मौका, अभियान हुआ सफल
27 जुलाई को मोहानगढ़ माइनर में पानी का स्तर अनुकूल होने पर दोनों राज्यों की संयुक्त टीम ने योजनाबद्ध तरीके से अभियान चलाया। विशेष जाल और प्रशिक्षित विशेषज्ञों की मदद से घड़ियाल को बिना किसी नुकसान के सुरक्षित पकड़ लिया गया।
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े सभी मानकों का पालन करते हुए प्राथमिक स्वास्थ्य जांच के बाद उसे विशेष वाहन से पंजाब के छतबीड़ चिड़ियाघर पहुंचाया गया।
ब्यास नदी में मिलेगा नया प्राकृतिक आवास
वन विभाग का कहना है कि ब्यास नदी संरक्षण रिजर्व में पहले भी बड़ी संख्या में किशोर घड़ियालों का सफल पुनर्वास किया जा चुका है। अब इस वयस्क नर घड़ियाल को वहां छोड़े जाने से प्रजनन क्षमता बढ़ने और घड़ियालों की आबादी को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह कदम संकटग्रस्त प्रजाति के दीर्घकालिक संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
अंतरराज्यीय सहयोग बना मिसाल
रेस्क्यू अभियान को पंजाब और राजस्थान के वन विभागों के बीच बेहतर समन्वय का उदाहरण माना जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में भी दुर्लभ वन्यजीवों के संरक्षण के लिए इसी तरह संयुक्त अभियान चलाए जाएंगे, ताकि संकटग्रस्त प्रजातियों को सुरक्षित प्राकृतिक आवास मिल सके।







